छत्तीसगढी बोली के मज़ेदार, लोकभाषा में हाना

छत्तीसगढ़ी हाना में जीवन दर्शन छत्तीसगढ़ी जनउला

 

छत्तीसगढी लोकभाषा में हाना 

छत्तीसगढी लोक साहित्य का भण्डार है।छत्तीसगढ़ी हाना में जीवन दर्शन छत्तीसगढ़ी जनउला का अनुभव समाया हुआ है।किसी समस्या के समाधान में हाना रामबाण औषधि सिद्ध होती है।साहित्य दो प्रकार का होता है।लिखित साहित्य और मौखिक साहित्य। मौखिक साहित्य को ही लोक साहित्य कहा जाता है।जो मुखाग्र होते है।जन उला( पहेली), हाना( लोकोक्ति), लोककथा,लोकगाथा, लोकगीत लोक साहित्य है।

हाना के द्वारा हम अपने विचार को कम शब्दो में अच्छे तरीके से, सार्थक रूप से व्यक्त कर सकते हैं। हाना हमारी जिंदगी में रहन सहन और आचार विचार को भी प्रभावित करते हैं। जीवन की कमियों एवं खूबियों को अच्छी तरीके से प्रकटीकरण करने का भी सशक्त माध्यम के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

यह बड़ी ही सहजता से हमारी भाषा तथा विचारों को भी कम शब्दों में व्यक्त करने की भूमिका में प्रमुखता से दिखाई पड़ती है।। हाना के द्वारा जहां हम किसी समस्या को सुलझाने मैं समर्थ होते हैं, वहीं हम लोगों को शिक्षा देने में भी सशक्त हो जाते हैं। यह हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा बनकर हमारी कमियों तथा विशेषताओं को देखने के लिए दर्पण तथा सीखने के लिए सिखावन की भूमिका मैं भी दिखाई पड़ती है।

आइए हम दैनिक जीवन से जुड़े कुछ बेहद रोचक हाना को समझने का प्रयास करते हैं जो छत्तीसगढ़ी हाना में जीवन दर्शन को प्रस्तुत करता है।

1 बो दे गहूं , चल दे कहूं।
अपनी जिम्मेदारी हमें स्वयं निभानी चाहिए।

2 अपन मरे बिन, सरग नइ दिखय।
काम की सफलता के लिए कष्ट उठाना पड़ता है।

3 तइहा के ला बइहा लेगे।पिछली बातें भूलकर आगे भी सोचना चाहिए।

4 अपन खेती, अपन सेती।
अपना काम हमें स्वयं करना चाहिए।

5 बोकरा के परान छूटे, खवइया ल अलोना।
दूसरे के कष्ट का स्वार्थी विचार रखने वाले व्यक्ति परवाह नहीं करता।

6 करिया आखर भैंस बराबर अनपढ़ के लिए काला अक्षर भैंस के समान होता है।

7 नकटा के नाक कटाय, अउ सवा हाथ बाढ़य।
बेशर्म व्यक्ति अपने आत्मसम्मान के बारे में नहीं सोचता।

8 सीखाय पूत पहार नइ चढ़ सकय ।
केवल मौखिक बातों से काम सिद्ध नहीं होता उसके लिए स्वयं परिश्रम करना पड़ता है।

9 गांव के जोगी जोगड़ा, बाहिर के साधु सिध।
व्यक्ति अपने नजदीक के व्यक्ति की बातें पर विश्वास नहीं कर के दूर के लोगों का विश्वास करता है।

10 अड़हा परान घाती।
नीम -हकीम- खतरा- ए -जान अर्थात अल्प ज्ञानी खतरनाक होता है उसकी बुद्धि के अनुसार चलने से अपनी ही हानि होती है।

11 मही माँगे ल जाय, ठेकवा ल लुकाय।
बुजुर्ग बताते हैं कि एक स्त्री पड़ोस में मट्ठा मांगने जाती तो ठेकवा अर्थात मिट्टी का बर्तन जिसमें मही मांगने आई थी उसे अपने पीछे छुपा लेती है थी। वह ऐसा संकोच के कारण करती थी ।उसे मही मांगने में लाज आती थी परंतु मजबूरी के कारण बर्तन छुपाकर जाना पड़ता था ।कवि का ऐसा कहना है कि जब मांगना ही हो तो शर्माते क्यों हो।

12 अधजल गगरी, छलकत जाय।
हम देखते हैं कि जो मटकी आधा भरा हुआ होता है, वह सर पर रख कर चलने से पानी बहुत ही झलकता है अर्थात कम बुद्धि वाले अधजल गगरी की तरह बहुत ज्यादा बोलते हैं। हाना ज्ञान का भंडार होता है। हाना से सीख भी मिलती है। कम शब्दों में बहुत बड़ी सीख की बात हाना द्वारा व्यक्त की जा सकती है।

13 धीर म खीर।
धीरज रखने का परिणाम अच्छा होता है।

14 साँच ल का आँच।
सच को कोई नहीं हरा सकता। सत्य की जीत होती है।

15 कलेवा म लाड़ू, नता म साढ़ू।
मीठा व्यंजन में लड्डू अच्छा लगता है रिश्तेदार में साढ़ू पत्नी के बहन का पति प्रिय होता है।

16 जाँगर चले न जंगरोटा।
काम धाम करना नहीं और खाने के लिए बढ़िया चाहिए व्यक्ति कामकाज नहीं करता और उसकी आवश्यकता अधिक होती है जैसे कहा गया है -काम ना काज का,
ढाईमन अनाज का ।
यह हाना आलसी व्यक्ति के लिए कहा गया है।

17 मन मा आन, मुंह में आन।व्यक्ति के मन में कुछ रहता है और मुंह मैं कुछ अर्थात बोलता कुछ और है। अर्थात व्यक्ति के आचरण के अनुसार कार्य नहीं होता।
जैसे कहा गया है –
मुंह में राम बगल में छुरी। अर्थात साधु के वेश में व्यक्ति चोरी करता है। दिन में राम-राम जपता है और रात में बुरा कार्य करता है।

18 महतारी के परसे, अउ मेघा के बरसे।
मां का दिया हुआ खाना से बच्चे का पेट भर जाता है उसी प्रकार मघा नक्षत्र की वर्षा से खेत का पेट भर जाता है अर्थात भरपूर फसल होती है।

19 छुई खदान के बस्ती, जय गोपाल के सस्ती।
छुई खदान का राजा साधु संत या वह कृष्ण भगवान का भक्त था वहां के लोग आपस में जय गोपाल कह कर एक दूसरे को संबोधित करते थे। छुई खदान के आसपास का संबोधन जय गोपाल से प्रारंभ होता है।

20 कारे जाथे बेटी,अउ नींदे कोड़े खेती।
यहां पर बेटी की सुंदरता की तुलना अच्छी खेती से की गई है। अर्थात अच्छी तरह के बाल संवारे हुए बेटी बड़ी सुंदर लगती है। उसी तरह से अच्छी तरह से नींदाई गुड़ाई की हुई खेती अच्छी लगती है। पैदावार भरपूर होता है।
अच्छी देखभाल का लाभ भी अच्छा होता है। बेटी की सुंदरता की तुलना सुंदर खेती से की गई है।

21 सीका के टूटती अउ बिलइ के झपटती।
अर्थात दूध का सींका जैसे ही टूटता है बिल्ली मौका पाते ही उस दूध पर झपट पड़ती है। अर्थात सहयोग से लाभ प्राप्त करना। बिल्ली सींका के टूटने की ताक में रहती है ताकि वह उसमें रखे दूध को पी सके।

22 दुधारू गाय के लात मीठा।
दूध देने वाली गाय का लात मीठा होता है अर्थात जिससे हमारा काम सिद्ध होता है उसकी कुछ बुरी आदतों को सहने में कोई बुराई नहीं है। उसका क्रोध सहना पड़ता है।

23 खाय बर जरी,बताय बर बरी।
कोई व्यक्ति जरी (जरी ऐसा पौधा है जिसका जड़ तथा पत्तियां साध के रूप में खाई जाती है जो सस्ता मिल जाता है) सब्जी खाता है और पूछने पर बड़ी बताता है। अर्थात सस्ती वस्तु सस्ती वस्तु खाना और महंगी बताना।

24 हप्टे बन के पथरा, फोरे घर के शील।
कोई व्यक्ति जंगल में पढ़े पत्थर में हपट जाता है और घर आकर अपने घर का सील तोड़ देता है। अर्थात दूसरे का गुस्सा दूसरे के ऊपर निकलता है।

25 संझा के पानी, बिहनिया के झगरा।
कहते हैं शाम के समय जो वर्षा होती है,वह रात भर बंद नहीं होता उसी प्रकार सुबह से जो लड़ाई झगड़ा शुरू होता है वह जल्दी खत्म नहीं होता।

26 मूँड़ के रहत ले,माँड़ी म पागा नइ बाँधय।
अर्थात बुजुर्गों के रहते बच्चों की सियानी नहीं चलती। जिस वस्तु का जो स्थान है वही जगह वह अच्छा लगता है।

27 हँड़िया के मुँह ल परइ म तोपे।
अर्थात हंड्डी के मुंह में ढक्कन लगाकर उसे बंद किया जा सकता है परंतु व्यक्ति के मुंह को कैसे बंद किया जा सकता है।

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28 चलनी म दूध दुहय,करम ल दोस देय।
चलनी मैं दूध दुहने से दूध तो नीचे गिरेगा ।उसी प्रकार अपना काम ठीक से नहीं आने पर व्यक्ति अपने किस्मत को दोस्त कैसे दे सकता है। जैसे कि कहा गया है -जैसी करनी वैसी भरनी।

29 रिस खाय बुध, बुध खाय परान।
क्रोध करने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट होने से व्यक्ति का प्राण भी जा सकता है। अर्थात व्यक्ति को किसी कार्य को सोच समझकर संतुलित मन से धैर्य पूर्वक करना चाहिए। क्रोध से काम बिगड़ता ही है।

30 बोय सोन जामय नही, मोती लुटे न डार।
गै समय बहुरय नही,
खोजे मिले न उधार।

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*इस हाना में बहुत ही सुंदर नीति की बात छिपी हुई है। सोने को बो देने से वह उगता नहीं है। वैसे ही मोती किसी डाली पर फलती नहीं है। जो समय निकल गया वह कभी वापस आता नहीं है न ही समय उधार में मिलता है। अर्थात व्यक्ति को कुछ पाने के लिए कुछ परिश्रम करना पड़ता है। व्यक्ति को अपने पास की वस्तुओं एवं समय का सदुपयोग करना चाहिए नहीं तो बाद में उसे पछताना पड़ सकता है।

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