पृथ्वी कैसे बनी
हमारी पृथ्वी कैसे बनी,आग के गोले में विस्फोट होने से अनेकों तारे बने, जो बहुत-सी आकाश-गंगाओं के रूप में बंट गये। आकाश गंगा के तारे सूर्य में भी आग के गोले की तरह विस्फोट हुए और ग्रह बन गए। इन ग्रहों में पृथ्वी ही वह सशक्त ग्रह है, जिसे हम अपनी दुनिया कहते है।
पृथ्वी पर खड़े होकर जब हम सूर्य को उदय और अस्त होता हुआ देखते हैं तो हमें ऐसा लगता है जैसा सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है, परन्तु अब वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर नहीं लगाता, बल्कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। पृथ्वी अपनी कीली पर घूमती हुई एक वर्ष में सूर्य का चक्कर लगाती है।
जब हम रेल के डिब्बे में बैठकर खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो हमें लगता है कि रेल की पटरी के दोनों ओर खड़े वृक्ष पीछे की ओर भाग रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह होती है कि वृक्ष अपनी जगहों
पर खड़े रहते हैं और रेल भागती हुई आगे निकलती चली जाती है। ठीक इसी प्रकार सूर्य अपने स्थान पर ही रहता और सत्य तो यही है कि पृथ्वी उसका चक्कर लगाती रहती है।
पृथ्वी कैसे बनी? दिन रात कैसे होता है?din raat kaise hota hai ?
पृथ्वी अपनी कीली पर चक्कर लगाती है। उसका जो भाग सूर्य के सामने आ जाता है, वहाँ प्रकाश हो जाता है, उसे हम दिन कहते हैं। जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता, वहाँ पर अंधेरा रहता है और उसे हम रात कहते हैं। पृथ्वी इसी तरह हर समय अंडाकार रास्ते पर चलकर सूर्य का चक्कर लगाती रहती है।
पृथ्वी की गति /प्रति घंटा ,
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में 67,000 मील प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ लगाती है। यह चक्कर लगाते हुए पृथ्वी को 300 करोड़ वर्ष से भी अधिक हो चुके हैं। इस अण्डाकार मार्ग की लम्बाई, जिस पर पृथ्वी चक्कर लगाती है, 9,30,00,000 मील से भी अधिक है।
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर 365.25 दिन में चक्कर लगाती है। यह यात्रा साठ करोड़ मील की होती है। इसे हम एक वर्ष कहते हैं। जितने में पृथ्वी सूर्य काएक चक्कर लगाती है, उतने दिन में ही पृथ्वी अपनी कीली पर 365.25 बार घूम जाती है। पृथ्वी के इस एक बार चक्कर लगाने को ही हम एक दिन कहते हैं। यह दिन चौबीस घण्टे अथवा चौदह सौ चालीस मिनट का होता है।
पृथ्वी पर जो दिन-रात और सर्दी-गर्मी तथा बरसात की ऋतुएँ देखते हैं, ये सब हमें सूर्य की ही गर्मी और प्रकाश से प्राप्त होते हैं। यदि सूर्य न हो तो यह गर्मी, सर्दी, बरसात, दिन और रात न हों। यदि ये सब न हों तो हमारी दुनिया ही बदल जाए। यह जो कुछ भी हम आज अपनी दुनिया में देख रहे हैं, सब समाप्त हो जाए। सर्दी, गर्मी और वर्षा से ही मनुष्य, जीव-जन्तु और वृक्षों इत्यादि का जीवन चलता है। ये लहलहाते हुए खेत और हरे-भरे जंगल सब सूर्य की गर्मी पर आधारित हैं।
पृथ्वी पर ठण्ड व् गर्मी एक सामान क्यों नहीं होती है ?
पृथ्वी अपनी कीली पर 23.5 डिग्री के कोण से ठहरी हुई है। इसलिए पृथ्वी का जो भाग सीधा सूर्य के सामने आता है, उस पर अधिक गर्मी होती है और जो भाग तिरछा पड़ता है वहाँ कम गर्मी होती है। यदि हम पृथ्वी के किसी भाग का तापमान जानना चाहें तोहमें देखना होगा कि वह भाग किस स्थान पर है और सूर्य की किरणें उस पर सीधी पड़ती हैं या तिरछी पड़ती हैं।
पृथ्वी पर वर्ष के जिन दिनों में न बहुत गर्मी होती है और न बहुत सर्दी, उन दिनों में सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी पड़ती हैं। इक्कीस मार्च का दिन ऐसा होता है जब सूर्य की किरणें सीधी भू-मध्य रेखा पर पड़ती हैं। उत्तरी ध्रुव पर उस समय वसन्त ऋतु होती है। इसी तरह बाईस सितम्बर को दक्षिणी ध्रुव पर बसन्त ऋतु होती है।
पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन का कारण पृथ्वी का झुकाव है। वर्ष में दो बार इक्कीस मार्च और बाईस सितम्बर को दिन-रात बराबर होते हैं। शेष सब दिन और रातों में कुछ-न-कुछ अन्तर होता है।इस तरह हमने देखा कि उस आग के गोले से अनेकों तारे बनें, जो बहुत-सी आकाशगंगाओं में अपने-अपने परिवार बनाकर बस गए। उसके बाद इन तारों ने ग्रहों और उपग्रहों को जन्म दिया। सूर्य ने, जैसे हम ऊपर कह चुके हैं कि पृथ्वी और अन्य ग्रहों को भी जन्म दिया।
पृथ्वी पर अपनी दुनिया आबाद हुई। यह दुनिया कैसे आबाद हुई, इसकी कहानी बहुत लम्बी है। यह करोड़ों वर्ष की कहानी है। कैसे यह सूर्य से छिटका हुआ टुकड़ा सूखी जमीन और समुद्रों में बदला और कैसे इस पर मनुष्य, जीव-जन्तु और पौधों ने जन्म लिया, कैसे ये पर्वत, नदी, झरने, इत्यादि बने? ये सब समझने की बातें हैं, परन्तु इस सबको समझने से पहले हमें सूर्य के अन्य ग्रहों का साधारण ज्ञान प्राप्त कर लेना आवश्यक है
पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहा जाता है
दोस्तो आपने इंद्रधनुष के बारे मे जरुर जानते होंगे जैसे कि इन्द्रधनुष, सात रंगों से मिलकर बनी होती।यह रंग कहाँ से आते हैं सुर्य के किरणों से । सूर्य के किरणों मे सात रंग- बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा पीला लाल नारंगी। रंगो की विशेषता होती है कि कुछ बड़ी , तो कुछ छोटी तरंगदैर्ध्य वाली किरणे होती है
रंग-लाल नारंगी, पीला,छोटी तरंगदैर्घ्य वाली रंग- बैंगनी नीला आसमानी, हरा। छोटी तरंगदैर्ध्य किरणों फैलाव ज्यादा होता है तो वहीं बड़ी तरंगदैर्ध्य वाली किरणों का वातावरण में फैलाव् कम होता है।
जैसे ही सूर्य की किरणें जब, धरातल पर आती है। तब पृथ्वी के वातावरण में विद्यमान छोटी कण सूर्य की रोशनी को सात रंगो में बाँटकर वातावरण में फैला देता है ।
हम जानते हैं कि पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग पानी से भरा हुआ है और पानी का कलर रंगहीन होता है। लेकिन पानी का गुण होता है कि वह बड़ी तरंग दैर्ध्य की किरणों को अपने में समाहित कर लेता है जैसे नारंगी पीला लाल रंग की प्रकाश किरणें और नीली प्रकाश की किरणों को रिफ्लेक्ट करता है ,जिसके कारण पृथ्वी अंतरिक्ष से नीला दिखाई देता है ,यही कारण है की पृथ्वी को नीला गृह कहा जाता है


